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आर्य वििाह विविमान्र्करण अविविर्म, 19371
(1937 का अविविर्म सखंर्ाकं 19)
[14 अप्रैल, 1937]
आर्य समाविर्ों में प्रचवलत अन्तर्ियिाहों को मान्र्ता
दिे ेतथा उिकी विविमान्र्ता के बारे में
शंकाओं का विराकरण करि ेके वलए
अविविर्म
आर्य समाविर्ों के िाम से ज्ञात, वहन्दओुं के एक िर्य के अन्तर्ियिाहों को मान्र्ता दिेा तथा उिकी विविमान्र्ता को शंकाओं के
परे रखिा समचीि ह;ै
अतः एतद द्वारा विम् िवलवखत रूप में र्ह अविविर्वमत ककर्ा िाता हःै—
1. सवंिप् त िाम और विस्तार—(1) इस अविविर्म का संविप् त िाम आर्य वििाह विविमान्र्करण अविविर्म, 1937 ह ै।
2[(2) इसका विस्तार 3[उि राज्र्िेत्रों के वसिार्, सम्पूणय भारत पर ह ैिो 1 ििम्बर, 1956 के ठीक पूिय भार् ‘ख’ राज्र्ों में
समाविष्ट थे] और र्ह भारत के िार्ररकों को भी, िहां कहीं भी िे हों लार्ू होता ह ै।]
2. आर्य समाविर्ों के बीच हुए वििाह का अविविमान्र् ि होिा—वहन्द ूविवि के ककसी उपबंि, प्रथा र्ा रूक़ि के प्रवतकूल होते
हुए भी, िो वििाह के समर् आर्य समािी ह ैऐसे दो व्यव तर्ों के बीच हुआ कोई वििाह, चाह ेिह इस अविविर्म के प्रारम्भ के पूिय र्ा
पश् चात ककर्ा र्र्ा हो केिल इस तथ्र् के कारण अविविमान्र् िहीं होर्ा र्ा कभी भी अविविमान्र् हुआ िहीं समझा िाएर्ा कक वििाह
के पिकार ककसी समर् वहन्दओुं की विवभन् ि िावतर्ों र्ा विवभन् ि उपिावतर्ों के थे र्ा पिकारों में से एक र्ा दोिों वििाह के पूिय ककसी
समर् वहन्द ूिमय से वभन् ि ककसी िमय के थे ।
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1 र्ह अविविर्म 1963 के विविर्म सं० 6 की िारा 2 और अिुसूची 1 द्वारा (1-7-1965 से) दादरा और िार्र हिलेी पर विस्ताररत ककर्ा र्र्ा ।
2 विवि अिुकूलि आदशे, 1950 द्वारा पूियिती उपिारा (2) के स्थाि पर प्रवतस्थावपत ।
3 विवि अिुकूलि (सं० 3) आदेश, 1956 द्वारा “भार् ख राज्र्ों” के स्थाि पर प्रवतस्थावपत ।
Open official source version ↗About this act
- Jurisdiction
- Central
- Enactment date
- 1937-04-14
- Sections available
- 2
Commencement information from the source
1937-04-14
Read the sections
India Code, Government of India. Text fetched 16 Oct 2026. Check the linked official text and subsequent notifications when applying a provision.